इतिहास कल्पना का विषय नहीं है। इतिहास = इति + आस अर्थात एसा निश्चित रुप से था। यह शोघ और अध्ययन पर ही पूर्ण जानकारी युकत होती है। कुल का इतिहास एक कल का होता है-सकल का नहीं वह भी सीमित। जाति अथवा देश का इतिहास ही वस्तुत: इतिहास का नाम धारण करने का अधिकारी है। किसी भी देश अथवा जाति को मिटाना हो तो उस देश-जाति को उसके इतिहास से दूर करदो अथवा उसके इतिहास को मिटादो तो वह देश और जाति भी समाप्त हो जाएगी। वर्तमान संतान एवं भावी संतानों को स्वस्थ प्रेरणा देने, अपने गौरवशाली पूर्वजों का उज्जवल इतिहास पढकर अपने अस्तमित होते हुए सूर्य को पुन: उदित होता हुआ देखे और संसार में अपना प्रकाश विस्तारिक करे, पूर्वजों की कीर्ति, पराक्रम मे़ अपना गोरव समझ सके।
प्रथम चरण - तत्कालीन सिरोही राज्य के ब्रम्हणवाड़ तीर्थ में विक्रम संवत 1990 में "श्री अखिल भारतवर्षीय पोरवाड महा - सम्मेलन" का प्रथम अधिवेशन हुआ था। उस अवसर पर भी प्रग्वाट इतिहास लिखाने का प्रस्ताव रखा था, परन्तु समाज ने इस और विशेष ध्यान नहीं दिया फिर भी कुछ सज्जनों ने इस और विशेष कार्य करने की शुरुआत कर ही दी थी।
जैन धर्म के प्रचारक इस अवसर्पिणी में 24 तीर्थंकर हो गये है। इनकी वाणियां हमें अब प्राप्त नहीं है इसलिए उनके समय में जातिवाद की मान्यता किस रुप में थी। जातिया एवं गोत्रों का विकास कब- कब और किन किन कारणों से हुआ इसको जानने के लिए तत्कालीन कोई साधन नहीं है। अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर की वाणी जैनागमों में संकलित की गई जो आज उपलब्ध है। उसमें हमें जैन धर्म और भगवान महावीर के जाति और वर्ण के संबंध में क्या विचार थे और उस जमाने में कुलों और गोत्रों का कितना महत्व था, कौन कौन से कुल एवं गौत्र प्रसिध्द थे सब बातों की जानकारी मिल जाती है।
23 वें जैन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के प्रथम पट्टधर श्रीमद शुभदन्ताचार्य थे और द्वितीय, तृतीय पट्टधर हरिदतसूरी और समुद्रसूरी अनुक्रम से हुए चतुर्थे पट्टधर श्रीमद केशीश्रमण थे। श्रीमद केशीश्रमण भगवान महावीर के काल में अति ही प्रमावक आचार्य हुए है। गौतम स्वामी (भगवान महावीर के प्रथम गणधर) और इनमें परस्पर बडा मेंल था। इनके पट्ट्धर श्रीमद स्वयंप्रभसूरी हुए जो कि विधाधरकुल नायक थे;अत: ये अनेक विधा एवं कलाओं में निष्णात थे। आपने अपने जीवन में यज्ञ और हवनों की पाखण्डपूर्ण क्रियाओं का उन्मूलन करना और शुध्द अहिसा धर्म का सर्वत्र प्रचार करना अपना प्रमुख ध्येय ही बना लिया था। ये बडे तपस्वी और उग्रविहारी थे। आपने यह अनुमान लगा लिया था कि जैन धर्म को जब तक लोग कुलमर्यादा पध्दति से स्वीकार नही करे़ तब तक सारे प्रयत्न निष्फल ही रहेंगे। उस समय अर्बुदाचल प्रदेश(आबू) में यज्ञ हवनादि का बडा जोर था। आपने अपने 500 शिष्यों सहित अर्बुदगिरी की और प्रयाण किया।
गोडवाड का सेवाडी ग्राम बाली नगर से थोडी ही दुर बसा हुआ है। यहा की पौषधशाला राजस्थान की अधिक प्राचीन पौषधशालाओं मे गिनी जाती है। इस पौषशाला के भद्दारको के आधिपत्य में ओसवाल और प्राग्वाट जाति के कई एक कुलो का लेखा है। जिनमें प्राग्वाट जाति के चौदह गोत्र है। ये कुल अधिकांशत: बाली और देसुरी प्रगणों में बसते है।
प्राग्वाट श्रावकों ने सभी क्षेत्रों में जबरदस्त उन्नत्ति की है तथा मातृभुमि कि सेवा की है वह क्षेत्र चाहे राजनैतिक हो या सामाजिक धर्म क्षेत्र हो या साहित्य व शिल्पकला था आर्थिक। आईये प्रत्येक क्षेत्र के बारे में थोडी थोडी जानकारी लेवे जिससे समग्र का अंदाजा लगाया जा सकेगा। राजनैतिक क्षेत्र -
विक्रम संवत की आठवी शताब्दी से लगाकर तेरहवी शताब्दी के अंत तक प्राग्वाट वर्ग जैसा धर्म एवं कर्तव्य क्षेत्र में प्रमुख रहा है, रणवीरता में भी उसका वैसा ही अपना विशिष्ट स्थान रहा है।
हम आभार ज्ञापित करना चाहेंगे सर्व प्रथम आचार्य श्री विजयतीन्द्रसूरीश्वरजी का जिनकी प्ररेणा से शाह ताराचन्द्रजी मेघराजजी पावा वालो ने प्राग्वाट जाती इतिहास लिखवाने का बीडा उठाया और श्री दौलतसिंहजी लोढा की कलम से यह हम तक पंहुच पाया।
उपरोक्त प्राग्वाट (पोरवाल) जाति का इतिहास आप तक संक्षिप्त रुप में प्रस्तुत किया गया है। इसे विस्तृत रुप से पढने के लिए श्री दौलत सिंह जी लोढा की पुस्तक प्राग्वाट- इतिहास अवश्य पढे।
प्राग्वाट - इतिहास पुस्तक निम्न स्थान से प्राप्त की जा सकती है। श्री वर्धमान जैन बोर्डिंग हाऊस (छात्रावास), हाईवे रोड, सुमेरपुर, जिला-पाली (राजस्थान)- 306902 फोन - (02933) 252085